CG News : डीएनए जांच नहीं होने से हत्या साबित नहीं हुई, हाईकोर्ट ने तीन आरोपियों को किया बरी

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हत्या के एक चर्चित मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए साक्ष्यों के अभाव में तीन आरोपियों को बरी कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि बरामद कंकाल का डीएनए परीक्षण नहीं होने से यह साबित ही नहीं हो पाया कि वह मृतक का ही था, इसलिए हत्या का आरोप संदेह से परे सिद्ध नहीं हो सका।

यह फैसला हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा ने सुनाया। आरोपियों ने सत्र न्यायालय पेंड्रा रोड द्वारा वर्ष 2015 में सुनाई गई दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा के खिलाफ अपील दायर की थी।

क्या था मामला

अभियोजन के अनुसार 2 जून 2013 को मरवाही थाना क्षेत्र के ग्राम धुम्माटोला में कमता प्रसाद पाठक उर्फ गन्नू की हत्या कर दी गई थी। आरोप था कि भवानी सिंह, जय सिंह और सुखसेन गोंड ने मिलकर हत्या की और शव को मिट्टी-पत्थरों से ढंककर छिपा दिया।

इसके बाद 31 जुलाई 2013 को मृतक की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई गई। पुलिस जांच के दौरान आरोपियों के कथित मेमोरेंडम के आधार पर 11 अगस्त 2013 को केहरा नाला बांध से एक कंकाल बरामद किया गया था।

पोस्टमार्टम और एफएसएल रिपोर्ट में नहीं मिला स्पष्ट कारण

पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि कंकाल से मौत का कारण स्पष्ट नहीं हो सका। वहीं एफएसएल रिपोर्ट में केवल यह कहा गया कि बरामद हड्डियां मानव की हैं, लेकिन मृत्यु का कारण और समय निर्धारित नहीं किया जा सकता।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख था कि हड्डियों को डीएनए प्रोफाइलिंग और डायटम टेस्ट के लिए सुरक्षित रखा गया है, लेकिन बाद में इनकी जांच नहीं कराई गई।

कोर्ट की अहम टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा कि जब अभियोजन का दावा है कि कंकाल आरोपियों की निशानदेही पर बरामद हुआ, तब यह साबित करना जरूरी था कि वह मृतक का ही कंकाल है। डीएनए जांच के अभाव में यह महत्वपूर्ण कड़ी साबित नहीं हो सकी।

अदालत ने यह भी पाया कि आरोपियों के पास से बरामद बताई गई लाठी और कुल्हाड़ी को अपराध से जोड़ने के लिए भी कोई ठोस साक्ष्य नहीं है। मेमोरेंडम और जब्ती के गवाह अदालत में अपने बयान से मुकर गए थे और हथियारों की रासायनिक जांच भी नहीं कराई गई थी।

आजीवन कारावास की सजा निरस्त

इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन संदेह से परे अपराध साबित करने में असफल रहा है। इसलिए सत्र न्यायालय द्वारा भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और 201/34 के तहत दी गई आजीवन कारावास की सजा को निरस्त करते हुए तीनों आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।

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