शिक्षा ही भारतीय मुस्लिम समाज की प्रगति का एकमात्र रास्ता

नई दिल्ली। भारत में मुसलमान दूसरा सबसे बड़ा धार्मिक और सामाजिक समूह है, लेकिन यदि साक्षरता दर, उच्च शिक्षा, रोजगार और अन्य सामाजिक-आर्थिक संकेतकों को देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि भारतीय मुस्लिम समाज की स्थिति कई क्षेत्रों में अन्य समुदायों की तुलना में चिंताजनक है। इसका सबसे बड़ा कारण शिक्षा की कमी और आधुनिक शिक्षा से दूरी है।

इस्लाम धर्म का पहला संदेश ‘इकरा’ (पढ़ो) था। कुरान शरीफ और हदीस दोनों में ज्ञान प्राप्त करने पर बहुत अधिक जोर दिया गया है। पैगंबर हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.) ने ज्ञान हासिल करने को हर मुस्लिम मर्द और औरत का फर्ज़ बताया है। हदीसों में यहाँ तक कहा गया है कि “ज्ञान हासिल करने के लिए चाहे चीन ही क्यों न जाना पड़े, जाओ।” इसके बावजूद आज मुस्लिम समाज का एक बड़ा हिस्सा दीनी और दुनियावी (आधुनिक) दोनों तरह की शिक्षा में पिछड़ा हुआ है। यह स्थिति न केवल मुस्लिम समाज के लिए, बल्कि पूरे देश के विकास के लिए एक बड़ी चुनौती है।

​सच्चर कमेटी की रिपोर्ट (2006) और रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट ने स्पष्ट रूप से यह साबित किया कि मुसलमानों की स्थिति कई मामलों में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों से भी बदतर है। रिपोर्ट के अनुसार, उच्च शिक्षा में मुसलमानों की भागीदारी बेहद कम है। हालांकि आज स्थिति में थोड़ा सुधार हुआ है, लेकिन अब भी बड़ी संख्या में मुस्लिम बच्चे या तो स्कूल नहीं जाते या फिर बीच में ही पढ़ाई छोड़ (ड्रॉपआउट) देते हैं। गरीबी, जागरूकता की कमी, स्कूलों की कमी और मदरसों तक ही सीमित रहने की सोच इसके मुख्य कारण हैं।

​मदरसा शिक्षा का अपना एक अलग महत्व है और यह धार्मिक पहचान और मूल्यों को सुरक्षित रखने का काम करती है। लेकिन केवल पारंपरिक मदरसा शिक्षा तक सीमित रहना आज की प्रतिस्पर्धी दुनिया में पर्याप्त नहीं है। मदरसों में धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा जैसे गणित, विज्ञान, अंग्रेजी, कंप्यूटर और सामाजिक विज्ञान को शामिल करना समय की मांग है। कई राज्यों में मदरसा आधुनिकीकरण के प्रयास हुए हैं, लेकिन इसे और अधिक व्यापक और प्रभावी बनाने की आवश्यकता है।

​इसके साथ ही भारतीय मुस्लिम युवाओं को केवल स्कूल तक ही नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, मेडिकल, इंजीनियरिंग, सिविल सर्विसेज और व्यवसाय प्रबंधन (Management) जैसे क्षेत्रों में आगे बढ़ना होगा। जब तक मुस्लिम युवा आधुनिक ज्ञान और कौशल से लैस नहीं होंगे, तब तक वे आर्थिक रूप से सशक्त नहीं हो सकते।

​इसके लिए यह भी आवश्यक है कि मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाए। एक शिक्षित महिला पूरे परिवार को शिक्षित करती है। मुस्लिम समाज में महिलाओं की शिक्षा के प्रति सकारात्मक बदलाव आ रहा है, लेकिन अभी भी उच्च शिक्षा में उनकी भागीदारी अपेक्षाकृत कम है। रूढ़िवादिता को छोड़कर बेटियों को उच्च शिक्षा और करियर के अवसर देना समाज के विकास के लिए अनिवार्य है।

​इसके साथ ही मुस्लिम समुदाय, स्वयंसेवी संगठनों और समाज के प्रबुद्ध नागरिकों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। समाज के सक्षम लोगों को आगे आकर गरीब और जरूरतमंद बच्चों की मदद करनी चाहिए। मेधावी छात्रों को छात्रवृत्ति (Scholarship) देना, कोचिंग संस्थानों की स्थापना करना और शिक्षा के प्रति जागरूकता फैलाना वक्त की सबसे बड़ी जरूरत है।

​निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि भारतीय मुस्लिम समाज की प्रगति का एकमात्र रास्ता शिक्षा ही है। शिक्षा ही वह औजार है जो गरीबी, बेरोजगारी और पिछड़ेपन की जंजीरों को तोड़ सकती है। जब तक मुस्लिम समुदाय शिक्षा को अपनी पहली प्राथमिकता नहीं बनाएगा, तब तक उसका सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास संभव नहीं है। इसलिए आइए, हम सब मिलकर शिक्षा की मशाल जलाएं और समाज के हर बच्चे को शिक्षित कर एक मजबूत और विकसित भारत के निर्माण में अपना योगदान दें।

​(लेखक शाहबुद्दीन जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में एक स्वतंत्र राजनीतिक विश्लेषक और लेखक हैं।)

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