एमए छत्तीसगढ़ी पाठ्यक्रम शुरू कराने वाले दुर्गा प्रसाद पारकर को मिलेगा राज्य अलंकरण, साहित्य में योगदान के लिए होंगे सम्मानित

भिलाई। छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के वरिष्ठ रचनाकार दुर्गा प्रसाद पारकर को उनके साहित्यिक योगदान के लिए प्रतिष्ठित राज्य अलंकरण से सम्मानित किया जाएगा। छत्तीसगढ़ी भाषा को लोकजीवन और बोलचाल की भाषा से आगे बढ़ाकर साहित्य तथा उच्च शिक्षा से जोड़ने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर में एमए छत्तीसगढ़ी पाठ्यक्रम शुरू कराने में उनके योगदान को विशेष रूप से उल्लेखनीय माना जाता है। इसी वजह से उन्हें एमए छत्तीसगढ़ी का प्रवर्तक भी कहा जाता है।

पारकर ने अपनी रचनाओं में छत्तीसगढ़ के लोकजीवन, संस्कृति, परंपराओं और आम लोगों के जीवन को प्रमुखता से स्थान दिया है। उनकी ‘चिन्हारी’ और ‘जस-जंवारा’ जैसी कृतियों में छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति और लोकआस्थाओं की झलक मिलती है। वहीं ‘शिवनाथ’, ‘सुकवा’, ‘चंदा’, ‘सोनचिरई’ और ‘सुराजी गांव’ जैसे नाटक भी काफी चर्चित रहे हैं। इन नाटकों में स्थानीय जीवन और सामाजिक सरोकारों को सहज भाषा में प्रस्तुत किया गया है। उनकी कई रचनाओं का मंचन भी हो चुका है।

उपन्यास लेखन में भी बनाई अलग पहचान

छत्तीसगढ़ी साहित्य के साथ उपन्यास लेखन में भी पारकर की विशिष्ट पहचान है। ‘केवंट कुंवारी’, ‘बहु हाथ के पानी’ और ‘दिलासा देवी केवंट’ जैसी रचनाओं में छत्तीसगढ़ी समाज, पारिवारिक संबंधों और मानवीय संवेदनाओं को अभिव्यक्ति मिली है।

उनकी कृति ‘बहु हाथ के पानी’ को शासकीय हेमचंद यादव विश्वविद्यालय, दुर्ग के बाद शहीद महेंद्र कर्मा विश्वविद्यालय, बस्तर के एमए पाठ्यक्रम में भी शामिल किया गया है। इससे छत्तीसगढ़ी साहित्य को उच्च शिक्षा के स्तर पर नई पहचान मिली है।

हिंदी साहित्य का छत्तीसगढ़ी में किया अनुवाद

दुर्गा प्रसाद पारकर ने हिंदी साहित्य की चर्चित रचनाओं का छत्तीसगढ़ी में अनुवाद भी किया है। उन्होंने हरिशंकर परसाई की रचनाओं के साथ मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास ‘निर्मला’ और ‘प्रतिज्ञा’ का छत्तीसगढ़ी अनुवाद किया। उनका मानना है कि किसी भाषा को मजबूत बनाने के लिए मौलिक लेखन के साथ दूसरी भाषाओं के श्रेष्ठ साहित्य का अनुवाद भी जरूरी है।

पारकर का साहित्यिक योगदान छत्तीसगढ़ी भाषा को लोकभाषा से आगे बढ़ाकर अकादमिक और साहित्यिक पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जाता है। राज्य अलंकरण से सम्मानित किया जाना उनके लंबे साहित्यिक सफर और भाषा के प्रति समर्पण का सम्मान है।

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