राज्यसभा में साहू समाज की अनदेखी पर फूटा गुस्सा: प्रदेश अध्यक्ष निरेन्द्र साहू ने भरी हुंकार, राजनीतिक दलों को दी दो टूक चेतावनी

रायपुर | 23 फरवरी 2026 छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा और प्रभावशली साहू समाज अब अपनी राजनीतिक उपेक्षा को लेकर आर-पार के मूड में नजर आ रहा है। छत्तीसगढ़ प्रदेश साहू संघ ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रदेश के विकास की धुरी रहने वाले इस बहुसंख्यक समाज को अब राज्यसभा में प्रतिनिधित्व चाहिए।

सोमवार को प्रदेश अध्यक्ष निरेन्द्र साहू के नेतृत्व में एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने भाजपा और कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात कर अपनी मजबूत दावेदारी पेश की।

दिग्गजों से मुलाकात, दिल्ली तक आवाज पहुँचाने की तैयारी

प्रतिनिधिमंडल ने रायपुर में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष श्री किरण सिंह देव और नेता प्रतिपक्ष चरण दास महंत से प्रत्यक्ष मुलाकात कर समाज की भावनाओं से अवगत कराया। साथ ही, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज से दूरभाष पर चर्चा कर समाज का पक्ष रखा।

“अब और इंतजार नहीं”: निरेन्द्र साहू

प्रदेश अध्यक्ष निरेन्द्र साहू ने दोटूक शब्दों में कहा कि छत्तीसगढ़ में सामाजिक और आर्थिक रूप से अग्रणी होने के बावजूद राज्यसभा में आज तक समाज के किसी व्यक्ति को अवसर न मिलना चिंताजनक है। उन्होंने कहा:

“साहू समाज केवल संख्या में बड़ा नहीं है, बल्कि जागरूक भी है। जो दल समाज की भावनाओं का सम्मान करते हुए हमारे प्रतिनिधि को राज्यसभा भेजेगा, समाज भी उसी दल के प्रति अपनी निष्ठा और सहयोग समर्पित करेगा।”

स्वाभिमान की लड़ाई: प्रदीप साहू

प्रदेश संयुक्त सचिव प्रदीप साहू ने कड़े शब्दों में बयान जारी करते हुए कहा कि यह केवल एक पद की मांग नहीं, बल्कि लाखों साहू बंधुओं के स्वाभिमान का सवाल है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या प्रदेश के निर्माण में खून-पसीना बहाने वाले साहू समाज का हक उच्च सदन पर नहीं है? समाज के भीतर इस उपेक्षा को लेकर गहरी भावनात्मक पीड़ा है।


प्रतिनिधिमंडल में ये रहे शामिल

इस दौरान मुख्य रूप से प्रदेश संयुक्त सचिव प्रदीप साहू के साथ गोपाल साहू, चुडामंडी साहू, रोबिन साहू, देवदत्त साहू, प्रवीण साहू, गोपी साहू, लुकेश साहू, गुलशन सहित समाज के अन्य प्रमुख पदाधिकारी उपस्थित रहे।

खबर का विश्लेषण

राजनीतिक गलियारों में इस मांग के बड़े मायने निकाले जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ की राजनीति में साहू वोट बैंक निर्णायक भूमिका निभाता है। ऐसे में राज्यसभा चुनाव से ठीक पहले समाज की यह लामबंदी दोनों प्रमुख दलों (भाजपा-कांग्रेस) के लिए बड़ी चुनौती पेश कर सकती है।

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