भिलाई निगम में ‘अंधेरगर्दी’: ₹1.5 करोड़ की देनदारी के बावजूद डिफाल्टर ठेकेदार को ₹13 लाख का भुगतान, कमिश्नर के खिलाफ EOW जाएगी BJP

भिलाई: नगर निगम भिलाई में सफाई ठेकेदार मेसर्स पीवी रमन पर मेहरबानी का एक बड़ा मामला सामने आया है, जिसने अब राजनीतिक तूल पकड़ लिया है। भाजपा के वरिष्ठ पार्षद पीयूष मिश्रा ने निगम प्रशासन पर गंभीर आर्थिक अनियमितता का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि ठेकेदार पर ₹1.5 करोड़ की बकाया देनदारी होने के बावजूद निगमायुक्त राजीव कुमार पांडेय ने डिफाल्टर ठेकेदार को ₹13 लाख का भुगतान कर दिया। पीयूष मिश्रा ने इस पूरे प्रकरण की शिकायत आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) में दर्ज कराने और आयुक्त के खिलाफ एफआईआर (FIR) कराने की चेतावनी दी है।

भाजपा पार्षद पीयूष मिश्रा ने तीखा हमला बोलते हुए कहा:

“यह विशुद्ध रूप से आर्थिक अपराध का प्रकरण है। सफाई कामगारों के पीएफ (PF) और ईएसआई (ESI) के करोड़ों रुपए डकारने वाले ठेकेदार को खुद निगमायुक्त बचा रहे हैं। हम इस भ्रष्ट कृत्य के खिलाफ चुप नहीं बैठेंगे और मामले को न्यायालय तक लेकर जाएंगे।”

4 आयुक्तों की रोक को किया दरकिनार, विदाई के दिन हुआ खेल

हैरानी की बात यह है कि इस सफाई ठेके की अवधि दिसंबर 2022 में समाप्त हो चुकी है। इसके बाद आए चार पूर्व निगमायुक्तों—आईएएस रोहित व्यास, देवेश ध्रुव, लोकेश चंद्राकर और बजरंग दुबे ने इस ठेकेदार के भुगतान पर सख्त रोक लगा रखी थी।

लेकिन असली खेल 25 मार्च को हुआ। जब सामान्य सभा में निगमायुक्त को हटाने का प्रस्ताव पारित हो रहा था, ठीक उसी दिन महज एक घंटे के भीतर स्वास्थ्य अधिकारी, आयुक्त और लेखा अधिकारी के हस्ताक्षर से ₹13 लाख की राशि जारी कर दी गई। यह राशि सिविक सेंटर स्थित ठेकेदार के एक नए बैंक खाते में ट्रांसफर की गई, क्योंकि ईपीएफओ (EPFO) ने रमन के पुराने बैंक खाते पहले से सीज कर रखे हैं। इतना ही नहीं, ठेकेदार को ₹18 लाख और भुगतान करने की फाइल भी अंदरखाने तैयार है।

कर्मचारियों का पैसा डकारा, ऐसे बना ₹1.5 करोड़ का बकाया

नगर निगम भिलाई ने अप्रैल 2021 से दिसंबर 2022 तक शहर की सफाई का ठेका पीवी रमन को दिया था, जिसे बाद में जनवरी-फरवरी 2023 तक बढ़ाया गया। इस दौरान जब कर्मचारियों को वेतन नहीं मिला और उन्होंने हड़ताल कर दी, तो निगम ने खुद सीधे वेतन बांटा और ठेकेदार के बिल से ₹2.73 करोड़ की कटौती की।

दिसंबर 2022 तक ठेकेदार का कुल बिल ₹5.36 करोड़ था। शेष ₹2.62 करोड़ में से ईपीएफ कमिश्नर ने सीधे खाते से ₹1.78 करोड़ की कटौती की। इसके बाद निगम ने ₹25 लाख अलग से जमा किए, जिससे ठेकेदार का बकाया ₹59 लाख बचा था।

एक्सटेंशन अवधि में हुआ असली ‘पीएफ घोटाला’

विवाद की मुख्य जड़ जनवरी और फरवरी 2023 की एक्सटेंशन अवधि है। इस दौरान सफाई कर्मचारियों का करीब ₹1 करोड़ का पीएफ और अप्रैल 2021 से फरवरी 2023 तक का करीब ₹50-60 लाख का ईएसआई (ESI) आज तक जमा नहीं किया गया है। नियमानुसार, कर्मचारियों का यह पैसा जमा कराने की कुल ₹1.5 करोड़ की देनदारी ठेकेदार पर बनती है।

दो ईपीएफ खाते खोलकर निगम को दिया धोखा

जांच में यह भी सामने आया है कि दस्तावेजों में ‘PERI VENKAT RAMAN’ के नाम से दो अलग-अलग ईपीएफ कोड (CGRA1132021900 और CGRA12611715000) मिले हैं। ठेकेदार ने कामगारों की पीएफ राशि को दो अलग खातों में जमा कर निगम को गुमराह किया। इसे सीधे तौर पर पीएफ गबन मानते हुए ठेका फर्म को ब्लैक लिस्ट (काली सूची में डालने) करने और एफआईआर दर्ज कराने की मांग की गई थी।

निगम के खजाने को सीधे चपत

नियमों के मुताबिक, मुख्य नियोक्ता (Principal Employer) होने के नाते कर्मचारियों का पीएफ और ईएसआई जमा कराने की अंतिम कानूनी जिम्मेदारी नगर निगम की होती है। पार्षद मिश्रा का आरोप है कि डिफाल्टर ठेकेदार से बकाया वसूलने और उसे ब्लैकलिस्ट करने के बजाय, सांठगांठ कर उसे भुगतान किया गया, जिससे निगम के खजाने को सीधा नुकसान पहुंचा है। इस पूरे मामले में अब उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच की मांग तेज हो गई है।

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