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बालोद | छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में बुधवार को प्री-पॉलिटेक्निक टेस्ट (PPT) परीक्षा केंद्रों के बाहर उस वक्त तनाव की स्थिति पैदा हो गई, जब कड़े नियमों और प्रशासनिक सख्ती के चलते 40 से अधिक छात्र परीक्षा देने से वंचित रह गए। किसी को गहरे रंग के कपड़ों की वजह से रोका गया, तो किसी को आधार कार्ड की मूल प्रति (Original) न होने के कारण प्रवेश नहीं मिला।
क्यों हुआ हंगामा?
- ड्रेस कोड की सख्ती: कई छात्राओं को गहरे रंग (Dark Color) के कपड़े पहनकर आने के कारण प्रवेश से मना कर दिया गया।
- पहचान पत्र का विवाद: छात्रों का आरोप है कि आधार कार्ड की फोटोकॉपी होने पर उन्हें मूल दस्तावेज लाने को कहा गया, और जब वे वापस लौटे तो समय बीतने की बात कहकर गेट बंद कर दिए गए।
- समय की पाबंदी: प्रशासन ने स्पष्ट किया कि एक सेकंड की भी देरी होने पर प्रवेश नहीं दिया गया।
छात्राओं का दर्द: ‘खुले में कपड़े कैसे बदलती’
भैंसबोड़ से आई छात्रा पूजा देवांगन ने प्रशासन की संवेदनहीनता पर सवाल उठाए। पूजा ने बताया कि वह समय पर केंद्र पहुंच गई थी, लेकिन डार्क कपड़ों के कारण उसे रोका गया। उसने कहा, “मैं भाई की टी-शर्ट पहनने को तैयार थी, लेकिन वहां कपड़े बदलने के लिए कोई सुरक्षित जगह या रूम नहीं दिया गया। एक लड़की होने के नाते मैं खुले में कपड़े कैसे बदलती?” अंततः उसे परीक्षा में बैठने नहीं दिया गया।
अभिभावकों और संगठनों का आक्रोश
दल्लीराजहरा से आए छात्र आदित्य पांडेय ने आरोप लगाया कि पहले वेरिफिकेशन कर लिया गया था, लेकिन बाद में तकनीकी कारणों का हवाला देकर प्रवेश रोक दिया गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए क्रांति सेना के पदाधिकारी भी मौके पर पहुंचे। जिलाध्यक्ष खोमन साहू ने कहा कि साल भर की मेहनत को मामूली कारणों से बर्बाद कर दिया गया, खासकर ग्रामीण क्षेत्र से आने वाले बच्चों के साथ यह अन्याय है।
प्रशासन का पक्ष: ‘नियम सबके लिए बराबर’
मौके पर पहुंचे अपर कलेक्टर अजय लकड़ा ने स्पष्ट किया कि परीक्षा के नियम बेहद सख्त हैं। उन्होंने कहा:
“परीक्षा केंद्र में निर्धारित समय के बाद प्रवेश का कोई प्रावधान नहीं है। चाहे एक सेकंड की ही देरी क्यों न हो, नियमों का पालन अनिवार्य है। परीक्षार्थियों को दिशा-निर्देशों का पालन पहले से करना चाहिए था।”
केंद्रों की स्थिति
खबरों के मुताबिक, शासकीय कन्या शाला में करीब 20 और लीड कॉलेज केंद्र में लगभग 25 परीक्षार्थी परीक्षा नहीं दे पाए। हालांकि अधिकारियों और पुलिस प्रशासन ने समझा-बुझाकर भीड़ को शांत किया, लेकिन बच्चों के भविष्य पर लगे इस प्रश्नचिह्न ने व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
