छत्तीसगढ़ी लोक संगीत के भीष्म पितामह खुमान साव की पहली प्रतिमा इस शहर में लगेगी...MIC ने दी मंजूरी

छत्तीसगढ़ी लोक संगीत के भीष्म पितामह खुमान साव की पहली प्रतिमा इस शहर में लगेगी...MIC ने दी मंजूरी  

February 19, 2021

भिलाई। छत्तीसगढ़ी लोक संगीत के भीष्म पितामह और चंदैनी गोंदा के संस्थापक स्व. खुमान साव की प्रतिमा राजनांदगांव शहर में लगेगी। यह उनकी पहली प्रतिमा होगी। 2019 में 90 वर्ष की आयु में खुमान साव का निधन हो गया था।
राजनांदगांव मेयर हेमा देशमुख की अध्यक्षता में महापौर परिषद की बैठक निगम स्थित महापौर कक्ष में संपन्न हुई। इस बैठक में फैसला हुआ कि खुमान साव की प्रतिमा शहर में लगाई जाएगी। वहीं राजनांदगांव के आनंद वाटिका का नामकरण किए जाने तथा मार्ग का नामकरण किए जाने के साथ-साथ अन्य विषयों पर स्वीकृति प्रदान की गई। मेयर हेमा ने कहा- खुमान साव सर म्युनिसिपल स्कूल में पढ़ाए हैं। राजनांदगांव और छत्तीसगढ़ को विशेष पहचान दिलाई।

लोक कला परंपरा के संपादक डीपी देशमुख कहते हैं- छत्तीसगढ़ी लोक संगीत की देश दुनिया में पहचान खुमान सर ने दिलाई। छत्तीसगढ़ के संगीत सम्राट कहे जाने वाले खुमान साव ने प्रदेश की लोक कला और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए चंदैनी गोंदा संस्था की स्थापना की। इसके माध्यम से उन्होंने पांच हजार से अधिक प्रस्तुतियां दीं।

इसके साथ ही आम लोगों की बोली में जमीन से जुड़े उनके गीत प्रदेश, देश की सरहदें पार कर सात समुंदर पार तक जा पहुंचे। संगीत के क्षेत्र में उनके विशेष योगदान के लिए भारत सरकार की ओर से उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

खुमान सर को जानने वाले बताते हैं कि छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से प्रदान किया जाने वाला मंदराजी सम्मान को न लेकर कला जगत में सनसनी पैदा कर दी थी। वे सम्मान देने के दोहरे मापदंड से असहमत और आहत थे। वर्ष 1929 को जन्मे खुमान साव की बचपन से ही रुचि संगीत में रही।

किशोर अवस्था में वे नाचा के युग पुरूष दाऊ मंदराजी के साथ जुड़ गए थे। 70 के दशक में उनकी मुलाकात दाऊ रानचंद्र देशमुख से हुई और यहीं से उन्होंने अपने जीवन की एक नई शुरुआत की। चंदैनी-गोंदा में वे बतौर संगीत निर्देशक काम करने लगे।

एक नजर खुमान सर के जीवन परिचय पर...
- 14 वर्ष की कच्ची उम्र में उन्होंने नाचा के युग पुरूष मंदराजी दाऊ की रवेली नाचा पार्टी में शामिल होकर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया।
- विभिन्न नाचा पार्टियों में अपनी प्रतिभा का परिचय देते हुए श्री साव ने बाद में राजनांदगांव में आर्केस्ट्रा की शुरूआत की।
- खुमान एंड पार्टी, सरस्वती संगीत समिति, शारदा संगीत समिति और सरस संगीत समिति का संचालन करते हुए उन्होंने अंत में राज भारती संगीत समिति तक का सफर तय किया, लेकिन आर्केस्ट्रा पार्टियों में फिल्मी गीत संगीत के अनुशरण से वे कतई संतुष्ट नहीं थे।

- उनके भीतर का संगीतकार उन्हें बार बार मौलिक संगीत रचना के लिए प्रेरित कर रहा था।
- सन 1970 में उनकी मुलाकात लोक कला मर्मज्ञ बघेरा निवासी दाऊ रामचंद देखमुख से हुई जो छत्तीसगढ़ की प्रथम लोक सांस्कृतिक संस्था ‘चंदैनी गोंदा’ के निर्माण की योजना बनाकर योग्य कलाकारों की तलाश में घूम रहे थे।
- उन्हें एक ऐसे संगीत निर्देशक की तलाश थी, जो छत्तीसगढ़ी आंचलिक गीतों में नया प्राण फूंक सके।

- श्री साव स्वयं अपनी मौलिक संगीत रचना की प्रस्तुति के लिए बेचैन थे। श्री देशमुख के आग्रह को स्वीकार कर श्री साव ‘चंदैनी गोंदा’ में संगीत निर्देशक के रूप में शामिल हुए।
- संगीतकार श्री साव और गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिया ने दिन-रात मेहनत कर ‘चंदैनी गोंदा’ के रूप में श्री देशमुख के सपने को साकार किया।
- 7 नवंबर 1970 से दुर्ग जिले के बघेरा से जारी ‘चंदैनी गोंदा’ की अविराम यात्रा 45 वर्षों बाद भी जारी है और श्री साव आज भी ‘चंदैनी गोंदा’ रूपी रथ के सारथी बने हुए थे।



विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन


समाचार और भी...