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नारीगाथा में आज डॉ. सोनाली चक्रवर्ती: इनकी डिक्शनरी में हाउस वाइफ शब्द ही नहीं... हजारों महिलाओं को डिप्रेशन से निकाला बाहर, देश के 300 से ज्यादा महिलाओं का स्वयंसिद्धा ग्रुप, कभी किचन तक सिमटी महिलाएं अब बनी जागरूकता दूत

नारीगाथा में आज डॉ. सोनाली चक्रवर्ती: इनकी डिक्शनरी में हाउस वाइफ शब्द ही नहीं... हजारों महिलाओं को डिप्रेशन से निकाला बाहर, देश के 300 से ज्यादा महिलाओं का स्वयंसिद्धा ग्रुप, कभी किचन तक सिमटी महिलाएं अब बनी जागरूकता दूत  

October 7, 2021

यशवंत साहू@ हमारे भिलाई टाइम्स के स्तंभ "नारी गाथा" के अंतर्गत आज हम आपको एक कहानी सुनाने जा रहे हैं। यह कहानी शुरू होती है भिलाई के सेक्टर छह स्थित एलआईसी कॉलोनी से । 1987-88 की बात है।
एक सातवीं आठवीं में पढ़ने वाली बच्ची स्कर्ट टॉप पहनकर अपने हाथ में एक रोल वाला ब्लैक बोर्ड और स्कूल की शिक्षिकाओं से मांगे हुए कुछ चौक के टुकड़े लेकर अपनी जेब में एक नेल कटर डालकर रोज पास में नहर किनारे की झोपड़पट्टी में जाया करती थी।

जिस जमाने में सोशल वर्कर,फेमिनिज्म और एक्टिविस्ट नाम किसी नहीं सुनी नहीं थी यह बच्ची झोपड़पट्टी में जाकर बच्चों को पढ़ाया करती थी, उनके गंदे नाखून काटती थी,उन्हें हाइजीन के विषय में बताती थी जब इन बच्चों की माताएं घरों में काम करने के लिए निकल जाती थी तब वह बच्चों को शिक्षित करने का काम करती थी।


 एक दिन उसे झटका सा लगा ।जब वह झोपड़पट्टी पहुंची तो उसने देखा कि एक लड़की को उसके घर वाले इतनी बुरी कदर मार रहे हैं कि लड़की के शरीर से जगह जगह से खून निकल रहा है और वो दांत भींच कर बिना रोए मार खा रही है।
 यह बच्ची वहां से भाग कर अपनी कॉलोनी वापस आती है तो वह लड़की भी इसे देखकर सहारे के लिए इसके पीछे पीछे भागती हुई आ जाती है और इनके बरामदे में ही बैठ जाती है। तब तक घर वाले भी उसके पीछे-पीछे आते हैं और उस समय तक कॉलोनी के बाकी लोग जमा हो गए थे।


शोरशराबे के बीच में कहानी पता चलती है कि इस लड़की ने किसी से प्यार करने का दुस्साहस किया था और वह उससे शादी करना चाहती थी इसलिए घर वाले उसे मार रहे थे । इन सारी वाद विवाद के बीच कक्षा आठवीं की यह बच्ची उस लड़की को ध्यान से देख रही थी। उसके चेहरे और शरीर पर कई जगह त्वचा फट चुकी थी व खून काला होकर जम गया था जिसमें मक्खियां भिनक रही थी परंतु लड़की के चेहरे पर ऐसी ढृंढ़ता थी मानो उसे किसी का डर नहीं।
इस दृश्य ने मन में गहरा असर डाला। गुरुनानक स्कूल के हर एक कार्यक्रम में भाग लेने वाली इस बच्ची के मन में समाज सेवा का भूत सवार था।

उन्हीं दिनों उसने पड़ोस में होने वाली एक दहेज हत्या भी देखी। पड़ोस की एक दीदी अपने ससुराल में जलकर मर गई थी और जब कॉलोनी के सारे लोग जमा थे तो दीदी के पापा सब के पास घूमते हुए कह रहे थे -"मेरे पास पैसे हैं ना... मेरी जेब में पैसे है। मैं अभी देता हूं। आप लोग कोई भी मेरी बेटी को वापस ला दीजिए "
इस दृश्य का भी उसके ऊपर गहरा असर पड़ा ।

एक दिन जब कॉलोनी में सारे बच्चे खेल रहे थे तो एक घर से आवाज़ें आने लगी। एक अंकल एक अपनी पत्नी को डांटते हुए कह रहे थे-" तुम्हें खाना बनाने के सिवा कुछ आता भी नहीं है... वह भी बेकार बनाती हो ।तुम अपने अपने काम से काम रखो मेरे फाइनेंसियल मामले में दखल देने की जरूरत नहीं है ।मेरे पॉलिसी में और बैंक में कौन नॉमिनी रहेगा इस बारे में बात मत करो"


 उस आंटी को रोते देखना इन इस बच्ची के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। इस बच्ची ने अपनी सहेली संध्या और श्रद्धा के साथ मिलकर 1989 में एक आनंद मेला आयोजित किया इसमें कॉलोनी के घरों की आंटियों ने अपने बनाए व्यंजनों के स्टाल लगाए ।हर घर में जाकर उस जमाने में आंटियों को यह समझाया कि वह अपने बनाए खाने को बेच भी सकती है। उनका खाना अच्छा है... यह नारी सशक्तिकरण की एक शुरुआत थी।


अगले पांच सालों तक ये कार्यक्रम चलता रहा जिसमें नौ बैंक कॉलोनी की कई महिलाओं ने अपने लिए ज़मीन तलाशी व एल.आइ.सी और बाकी बैंक प्रबंधनों ने सहयोग करना प्रारंभ किया।
 यह बच्ची थी डॉ.सोनाली चक्रवर्ती जिन्हें आज हम भिलाई के विमेन एक्टिविस्ट्स के नाम से जानते हैं ।

1989 से 1994 तक सारे बैंक कॉलोनी की महिलाओं को सशक्तिकरण की राह पर चलाते हुए इन बच्चियों ने बहुत से कार्यक्रम किए जो कि इनके महिला जागरूकता अभियान की शुरुआत थी।


स्कूल कॉलेज हर जगह वाद विवाद से लेकर रंगोली तक हर एक प्रतियोगिता में इनाम जीतने वाली डॉ.सोनाली चक्रवर्ती ने विवाह पश्चात भी अपनी पहचान बनाना जारी रखा ना केवल स्वयं बल्कि अपने साथ महिलाओं को धीरे-धीरे जोड़ने लगी।उन्हें उनके अस्तित्व का एहसास करवाने लगी। 2007 में इन्होने भिलाई महिला समाज से जुड़ने का फैसला किया।

तत्कालीन महासचिव शिखा सत्पति ने उनसे कहा कि मरोदा यूनिट बंद होने वाला है उसमें सिर्फ 3 सदस्य हैं। हम उसे बंद करने का सोच रहे हैं। तुम्हारे घर के पास है यदि तुम उसे चला सको तो देख लो। सोनाली ने इसे एक चुनौती की तरह लिया और एक हफ्ते बाद ही ग्रुप में 8 सदस्यों की टीम तैयार हो गई जो महीने भर बाद 22 सदस्यों में बदल गई ।

यही नहीं उन्होंने मरोदा के आसपास की महिलाओं को घर-घर जाकर जोड़ा। रास्ते में बाजार में उनसे बात करते हुए उन्हें उनकी पहचान बनाने के लिए प्रोत्साहित किया और महिला समाज द्वारा नारी सशक्तिकरण के इतने बेहतरीन काम किए कि उन्हें देने के लिए बेस्ट क्लब की ट्रॉफी का आगाज़ किया गया ।
तत्कालीन अध्यक्ष श्रीमती सीमा अरोड़ा ने उनसे कहा तुम्हारे क्लब की एक्टिविटीज देखकर तो मुझे लगता है इसे बेस्ट क्लब की ट्राफी देनी चाहिए और इस प्रकार शुरू हुआ बेस्ट ट्रॉफी देना जो आज भी चल रहा है ।
सोनाली चक्रवर्ती ने यह ट्रॉफी दो बार जीता।


उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इन्होंने महिला समाज के इतिहास में सबसे बड़ा कार्यक्रम करवाया जिसमें 80 महिलाओं के साथ भारतीय नारी के इतिहास पर 2 घंटे का शो बनाया जिसे तत्कालीन सीइओ पंकज गौतम ने 21 हजार का इनाम दिया था।
इस प्रकार वे छत्तीसगढ़ की प्रथम "महिला लाइट एंड साउंड शो राइटर व डायरेक्टर" बन गईं। 5 वर्षों तक समाचार वाचिका एवं 5 वर्षों तक स्वतंत्र पत्रकार के रूप में प्रतिष्ठित अखबार में अपनी सेवाएं देने के बाद आज वे विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में महिला सशक्तिकरण पर स्वतंत्र लेखक के रूप में लिखती हैं।

उसके बाद उन्होंने अपनी संस्था 'स्वयंसिद्धा' की शुरुआत की। गृहिणियों को ग्रूम करना शुरू किया ,महिलाओं के व्यक्तित्व विकास के साथ उन्हे अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए प्रेरित किया। उन्हें संगीत सीख कर खैरागढ़ विश्वविद्यालय से परीक्षा देने के लिए प्रेरित किया ।
उनके अंदर छुपी हुई प्रतिभा को पहचान के उन्हें मंच व सम्मान दिलाने की चेष्टा में वे लगातार प्रयासरत हैं।


सोनाली गत पंद्रह वर्षों में हजारों महिलाओं को मिडल एज क्राइसिस,डिप्रेशन, फ्रस्ट्रेशन से बाहर निकाल कर अपनी पहचान बनाने के लिए प्रेरित कर चुकी है। मानसिक बीमारियों से निकालने में सोनाली चक्रवर्ती ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई है।
इन हाउस वाइफ के साथ मिलकर जिन्हें लोग कहते थे "दिन भर करती क्या हो घर में' इन्होंने स्वच्छता, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, स्त्री शिक्षा, कन्या भ्रूण हत्या, मानसिक निशक्त बच्चों को समाज की मुख्यधारा में लाना, वृद्धजन , युवा बाल समस्याओं को मुख्य रूप से उठाना, स्वच्छता, पर्यावरण, परवरिश आदि विषयों को अपने सामाजिक सरोकार के नाटकों के मंचिन द्वारा समाज को जागरूकता की दिशा में वे लगातार प्रयासरत है।


आज ना केवल दुर्ग भिलाई वरन रायपुर, राजनांदगांव, धमतरी ,मुंगेली, जबलपुर, जगदलपुर ,रायगढ़ के साथ अब जमशेदपुर, बर्नपुर दुर्गापुर ,कोलकाता ,चेन्नई, हुबली (कर्नाटक), नैनीताल, गोवा, अहमदाबाद आदि शहरों में इनके सदस्य हैं, जिनमें ना केवल गृहिणियां बल्कि डॉक्टर, शिक्षिका, वकील, इंजीनियर, बैंककर्मी, उद्यमी, कलाकार आदि कामकाजी महिलाएं भी शामिल हैं

हिंदी साहित्य में पीएचडी डॉ सोनाली चक्रवर्ती ने मंच संचालन के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय काम किया है रविंद्र जैन से लेकर पंडित विश्वमोहन भट्ट तक व राज्यपाल से लेकर इस्पात मंत्री तक के कार्यक्रम का संचालित कर चुकी है एवं महिलाओं को संचालन का प्रशिक्षण भी देती हैं।


स्लम के बच्चों को नशा मुक्त करने में इन्होंने उल्लेखनीय कार्य किया है। सैकड़ों बच्चों को पॉजिटिव कार्यों में लगाकर नशे की गिरफ्त से छुड़ाने में यह लगातार प्रयासरत हैं । बच्चियों की सुरक्षा के लिए दुर्ग पुलिस के साथ मिलकर उन्होंने 'टच' नामक फिल्म का निर्माण किया था जिसका लेखन, निर्देशन, कॉस्टयूम ,मेकअप ,सेट डिजाइनिंग ,संवाद तक इनके स्वयं के थे जिसके लिए तत्कालीन कलेक्टर श्री उमेश अग्रवाल एवं आई.जी. दीपांशु काबरा ने सम्मानित किया था।


डॉ.सोनाली चक्रवर्ती कहती है -"खुद के लिए तो सभी काम करते हैं पर जब मैं अपनी जैसी बहनों के लिए काम करती हूं तो उस समय लगता है बचपन में देखी हुई  मिडल एज आंटियों की व्यथा कुछ तो कम हो रही होगी जो ना अपनी मर्जी से शादी कर सकती थी ,ना अपनी मर्जी से घर चला सकती थी। दहेज के लिए मरती हुई, अस्तित्व के लिए लड़ती हुई इन महिलाओं के लिए कुछ करना ही मेरा ध्येय है।


डॉ.चक्रवर्ती अपने सामाजिक कार्यों का सारा श्रेय अपने परिवार के सहयोग को देती हैं इनके पति श्री संदीप चक्रवर्ती भिलाई इस्पात संयंत्र के सामग्री प्रबंधन विभाग में महाप्रबंधक के रूप में कार्यरत हैं एवं पुत्र शाश्वत चक्रवर्ती ने 2020 में जेईई मेंस एवं एडवांस में छत्तीसगढ़ स्टेट टॉप किया था एवं संप्रत्ति आईआईटी बॉम्बे में द्वितीय वर्ष का छात्र है एवं सासू मां श्रीमती गौरी चक्रवर्ती इन 96 वर्ष की है।


भिलाई टाइम्स के लिए नारीगाथा लिखने वाली सोनाली चक्रवर्ती कहती है -"हमारी जीत का क्षण वह होता है जब हम घर  परिवार की सारी जिम्मेदारियां निभाने के बाद राज्योत्सव से लेकर सरस मेला तक व श्रीभूमि उत्सव दिल्ली, वरदांबिका कला मंच गोवा, राष्ट्रीय कलाकार सम्मेलन माउंट आबू आदि में कार्यक्रम करते हैं तो 'ग्रुप ऑफ़ मैरिड वूमेन' सुनते ही दर्शक हमारा जो तालियों से इस्तकबाल करते हैं वह हम सबकी आंखों में आंसू ला देता है।

 "और हां अब हमसे कोई नहीं कहता कि दिनभर करती क्या हो घर में"



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