बच्चों का भविष्य हमारी थाली में: स्वस्थ बचपन से ही बनेगा सशक्त छत्तीसगढ़; यूनिसेफ सलाहकार ने दिए खास टिप्स

रायपुर | आधुनिक जीवनशैली के बीच बच्चों में बढ़ता मोटापा और बीमारियाँ एक गंभीर चुनौती बन गई हैं। इस दिशा में यूनिसेफ़ (UNICEF) की पोषण सलाहकार सुश्री नमिता पाण्डेय ने एक विशेष लेख के माध्यम से समाज और परिवारों को जागरूक करने का प्रयास किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि मोबाइल, टीवी और जंक फूड की बढ़ती पैठ ने बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को खतरे में डाल दिया है।

बदलते दौर की चुनौतियाँ: स्क्रीन टाइम और जंक फूड

नमिता पाण्डेय के अनुसार, घंटों स्क्रीन के सामने बैठने और खेल के मैदानों से दूरी के कारण बच्चों में कम उम्र में ही टाइप-2 मधुमेह, उच्च रक्तचाप और थायरॉइड जैसी बीमारियाँ देखी जा रही हैं। यह केवल स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं है, बल्कि इससे बच्चों का आत्मविश्वास भी प्रभावित हो रहा है।

छत्तीसगढ़ सरकार की ठोस पहल

राज्य में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में बच्चों और माताओं के स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है। महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े के मार्गदर्शन में विभाग स्थानीय खाद्य परंपराओं को पुनर्जीवित करने और पोषण अभियानों को गाँव-गाँव तक पहुँचाने का कार्य कर रहा है।

‘7 स्टार भोजन थाली’ और पारंपरिक आहार का जादू

लेख में स्वस्थ जीवन के लिए 7 स्टार भोजन थाली का मॉडल सुझाया गया है, जिसमें कैलोरी, प्रोटीन, आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन का सही संतुलन होता है।

  • मिलेट्स की वापसी: रागी, बाजरा, ज्वार और कोदो-कुटकी जैसे पारंपरिक मोटे अनाज न केवल वजन संतुलित रखते हैं, बल्कि पाचन और ऊर्जा के लिए भी श्रेष्ठ हैं।
  • व्यंजन: रागी की इडली और कोदो की खिचड़ी जैसे स्वादिष्ठ विकल्पों को बच्चों की डाइट में शामिल करने की सलाह दी गई है।

1,000 दिन: मस्तिष्क विकास का स्वर्ण काल

वैज्ञानिक तथ्यों का हवाला देते हुए लेख में बताया गया कि गर्भधारण से लेकर बच्चे के 2 वर्ष की आयु तक के पहले 1,000 दिन सबसे महत्वपूर्ण होते हैं।

“5 वर्ष की आयु तक बच्चे के मस्तिष्क का 90 प्रतिशत विकास हो जाता है। इस दौरान सही पोषण और सकारात्मक पारिवारिक वातावरण बच्चे के भविष्य की नींव रखता है।”

मोबाइल से मैदान की ओर लौटने का आह्वान

राष्ट्रीय पोषण पखवाड़ा 2026 के अवसर पर यह संदेश दिया गया कि स्वास्थ्य कोई सीमित अभियान नहीं, बल्कि एक संस्कृति है। इसके लिए तीन बड़े बदलाव जरूरी हैं:

  1. मोबाइल से मैदान की ओर: शारीरिक सक्रियता बढ़ाना।
  2. जंक फूड से पारंपरिक आहार की ओर: घर की रसोई को पोषण का केंद्र बनाना।
  3. लापरवाही से जागरूकता की ओर: हर परिवार को पोषण के प्रति सजग होना होगा।

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