छत्तीसगढ़ में PESA कानून को मिली मंजूरी: अब न्याय करेंगी ग्राम सभाएं… पंचायतों के पास होगा बड़े निर्णय लेने का अधिकार

रायपुर। छत्तीसगढ़ में PESA (Panchayat Extension of Schedule Area) कानून को मंजूरी दे दी गई है। भूपेश बघेल सरकार ने आज कैबिनेट बैठक के दौरान पेसा नियम को लागू करने का निर्णय लिया। इस कानून को लागू होने के बाद अब पंचायतों में स्वशासन सुनिश्चित किया जाएगा। राज्य सरकार में मंत्री टीएस सिंहदेव ने इस फैसले पर हर्ष व्यक्त किया है।


टीएस सिंहदेव ने एक ट्वीट में लिखा कि, ‘आप सभी के साथ यह साझा करते हुए अत्यंत प्रसन्नता हो रही है कि राहुल गांधी की मंशा के अनुरूप जन घोषणापत्र 2018 में जो पेसा नियम छत्तीसगढ़ में लागू करने का फैसला हम सभी ने मिलकर लिया था, वह कैबिनेट की बैठक में पूर्ण हुआ है। विगत 2.5 साल से अनुसूचित जनजाति वर्ग के राष्ट्रीय व क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों, पार्टी के प्रतिनिधियों व वरिष्ठ समाजसेवियों से चर्चा उपरांत जो मसौदा हमनें प्रस्तुत किया उसे स्वीकृति प्रदान करने के लिए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और कैबिनेट के सभी साथियों का बहुत-बहुत आभार।’

सिंहदेव ने आगे लिखा कि, ‘पेसा कानून को स्वीकृति मिलना हमारा पहला कदम है और भविष्य में इसकी व्यावहारिकता को देखते हुए संशोधन, अधिकार में बढ़ौतरी समेत अन्य संभावनाएं खुली हुई हैं। इसके साथ ही अन्य समाज के लोगों के हितों की रक्षा के लिए भी इसमें आबादी के अनुपात पर स्पष्ट प्रावधान हैं। पेसा नियम के अंतर्गत सभी वर्गों को ग्राम सभा की समितियों में प्रतिनिधित्व मिलेगा। अनुसूचित जनजाति वर्ग को न्यूनतम 50% प्रतिनिधित्व का प्रावधान है, इसके साथ ही ओबीसी, अनुसूचित जाति, अनारक्षित वर्ग सभी को उनकी आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व का अवसर मिलेगा।’


उन्होंने यह भी लिखा कि, ‘इन नियमों की स्वीकृति पर मुझे बहुत प्रसन्नता है कि पंचायत व ग्रामीण विकास विभाग की जिम्मेदारी निभाते हुए एक बड़ी उपलब्धि कांग्रेस पार्टी, राहुल गांधी, मुख्यमंत्री बघेल व सभी कैबिनेट के साथियों के साथ हम लोगों ने छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचल के नागरिकों को उपलब्ध करवाई है।’ बता दें कि यह कानून जनजातीय समुदायों, अनुसूचित क्षेत्रों के निवासियों के स्वशासन की अपनी प्रणालियों के माध्यम से खुद को नियंत्रित करने के अधिकार को मान्यता देता है।

इस कानून के लागू होने के बाद अब जंगली इलाकों में किसी काम के लिए सरकार की ही नहीं बल्कि आदिवासियों की सहमति भी जरुरी होगी। इस कानून के लागू होने से उन इलाकों में सरकार की मनमर्जी के अलावा उन क्षेत्र के लोगों की सहमति से ही काम होंगे। उनको अधिकार दिए जाएंगे। कमेटियों, समितियों और आदिवासी वर्ग से बात करके ही पेसा कानून बनाया जा रहा है।

जानिए क्या है पेसा अधिनियम-1996
पेसा कानून समुदाय की प्रथागत, धार्मिक एवं परंपरागत रीतियों के संरक्षण पर असाधारण जोर देता है। इसमें विवादों को प्रथागत ढंग से सुलझाना एवं सामुदायिक संसाधनों का प्रबंध करना भी सम्मिलित है। कानून की धारा 4 अ एवं 4 द निर्देश देती है कि किसी राज्य की पंचायत से संबंधित कोई विधि उनके प्रथागत कानून, सामाजिक एवं धार्मिक रीतियों तथा सामुदायिक संसाधनों के परंपरागत प्रबंध व्यवहारों के अनुरूप होगी और प्रत्येक ग्राम सभा लोगों की परंपराओं एवं प्रथाओं के संरक्षण एवं संवर्द्धन, उनकी सांस्कृतिक पहचान, सामुदायिक संसाधनों एवं विवादों को प्रथागत ढंग से निपटाने में सक्षम होंगी।

पेसा कानून का पूरा नाम
पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम 1996 {the Panchayat (Extension to the Scheduled Areas) Act, 1996} जो पेसा के नाम से जाना जाता है, संसद का एक कानून है न कि पांचवीं एवं छठी अनुसूची जैसा संवैधानिक प्रावधान। परंतु भारत की जनजातियों के लिए यह उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने वे संवैधानिक प्रावधान।

जैसा कि हम देख चुके हैं, छठी अनुसूची इसके अंतर्गत आने वाले सीमित जनजाति क्षेत्रों को ही अपने स्वयं को स्वायत्त रूप से शासित करने का अधिकार देती है। पेसा कानून अपनी परंपराओं एवं प्रथाओं के अनुसार पांचवीं अनुसूची की जनजातियों को उसी स्तर का स्वायत्त शासन देने की संभावनाओं का अवसर प्रस्तावित करता है। इसलिए इन क्षेत्रों के लिए यह अधिनियम एक मूलभूत कानून का स्थान रखता है।

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