बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि पति और उसके परिवार पर दहेज उत्पीड़न तथा टोनही प्रताड़ना जैसे झूठे आरोप लगाना मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है। कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए पति की तलाक याचिका स्वीकार कर ली।
हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा ने बलौदाबाजार फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए पति के पक्ष में तलाक की डिक्री जारी की।

मामले के अनुसार बलौदाबाजार निवासी दिनेश साहू और पद्मा साहू का विवाह 15 फरवरी 2015 को हुआ था। पति के अनुसार विवाह के लगभग 10-11 दिन बाद ही पत्नी मायके चली गई और अलग रहने का दबाव बनाने लगी। इसके बाद पत्नी ने पति, उसके माता-पिता और भाइयों सहित परिवार के पांच सदस्यों के खिलाफ दहेज प्रताड़ना और टोनही प्रताड़ना अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज करा दी थी।
इन आरोपों के बाद पति ने बलौदाबाजार फैमिली कोर्ट में क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक की याचिका दायर की थी। हालांकि फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि क्रूरता और परित्याग के आरोप पर्याप्त रूप से साबित नहीं हुए हैं। इसके खिलाफ पति ने हाईकोर्ट में अपील दायर की।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि पति और उसके परिजनों पर टोनही जैसे गंभीर और सामाजिक रूप से अपमानजनक आरोप लगाए गए, जिससे उन्हें लंबे समय तक मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी। अदालत ने कहा कि पति और उसके परिवार को लगभग सात वर्षों तक झूठे मुकदमों का सामना करना पड़ा, जो अपने आप में गंभीर मानसिक पीड़ा का कारण है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार के झूठे और गंभीर आरोप वैवाहिक संबंधों में मानसिक क्रूरता के दायरे में आते हैं। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पति की तलाक याचिका स्वीकार कर ली। साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि पत्नी चाहे तो हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के तहत गुजारा भत्ता के लिए अलग से आवेदन प्रस्तुत कर सकती है।

