दुर्ग। हेमचंद यादव विश्वविद्यालय, दुर्ग के तृतीय वर्ष के कई छात्र परीक्षा परिणाम और री-वैल्यूएशन प्रक्रिया को लेकर परेशान हैं। छात्रों का आरोप है कि रिजल्ट में English सहित अन्य विषयों में Fail/Supply आने के बाद री-वैल्यूएशन के लिए करीब 250 रुपये शुल्क लिया गया, लेकिन उसका परिणाम जारी होने से पहले ही Supplementary परीक्षा के फॉर्म भरने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई।
छात्रों के मुताबिक, Supplementary परीक्षा के लिए करीब 820 रुपये शुल्क निर्धारित किया गया और आवेदन की अंतिम तिथि 10 अगस्त 2026 रखी गई। ऐसे में री-वैल्यूएशन के परिणाम का इंतजार कर रहे छात्रों के सामने असमंजस की स्थिति पैदा हो गई। छात्रों को डर था कि यदि री-वैल्यूएशन में परिणाम में सुधार नहीं हुआ तो सप्लीमेंट्री परीक्षा का फॉर्म भरने की समय-सीमा समाप्त हो सकती है।
वर्ष खराब होने की आशंका के चलते कई छात्रों ने मजबूरी में Supplementary परीक्षा का फॉर्म भी भर दिया। छात्रों का कहना है कि इससे उन्हें री-वैल्यूएशन के 250 रुपये के अलावा करीब 820 रुपये की अतिरिक्त फीस जमा करनी पड़ी। यदि बाद में री-वैल्यूएशन में छात्र पास हो जाता है, तो सप्लीमेंट्री के लिए जमा की गई फीस का क्या होगा, इसे लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है।

छात्रों की प्रमुख मांगें
छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन से री-वैल्यूएशन और सप्लीमेंट्री परीक्षा की प्रक्रिया को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की है। छात्रों की मांग है कि री-वैल्यूएशन के परिणाम जल्द जारी किए जाएं और जिन विद्यार्थियों ने री-वैल्यूएशन के बावजूद मजबूरी में सप्लीमेंट्री का फॉर्म भरा है, उनके मामले में विश्वविद्यालय स्पष्ट नीति बताए।
छात्रों का यह भी कहना है कि यदि री-वैल्यूएशन के बाद कोई विद्यार्थी पास हो जाता है, तो उसके द्वारा जमा की गई Supplementary परीक्षा फीस के संबंध में विश्वविद्यालय को स्पष्ट निर्णय लेना चाहिए। साथ ही भविष्य में री-वैल्यूएशन और सप्लीमेंट्री परीक्षा की आवेदन प्रक्रिया के बीच पर्याप्त समय का अंतर रखा जाना चाहिए।
पारदर्शी व्यवस्था की मांग
छात्रों का कहना है कि मामला केवल अतिरिक्त फीस का नहीं है, बल्कि परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता और विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ा हुआ है। उनका आरोप है कि यदि री-वैल्यूएशन का परिणाम आने से पहले सप्लीमेंट्री का फॉर्म भरने की अंतिम तिथि रखी जाती है, तो विद्यार्थियों पर आर्थिक और मानसिक दोनों तरह का दबाव बनता है। अब छात्रों की नजर विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर है कि इस मामले में क्या स्पष्टीकरण और राहत दी जाती है।

