नई दिल्ली। परिसीमन को लेकर आदिवासी समाज में भ्रम और आशंकाएं फैलाए जाने के आरोपों के बीच एक बयान जारी कर दावा किया गया है कि कुछ निहित स्वार्थ वाले समूह अनुसूचित जनजातियों (ST) के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी आने की बात कहकर समाज को गुमराह करने का प्रयास कर रहे हैं। बयान में कहा गया है कि ऐसे दावे संविधान और उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित नहीं हैं।
जारी बयान में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 का हवाला देते हुए कहा गया है कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों का आरक्षण उनकी जनसंख्या के अनुपात में सुनिश्चित किया जाता है। बयान के अनुसार, वर्ष 2001 की जनगणना में अनुसूचित जनजातियों की आबादी लगभग 8.43 करोड़ थी, जो 2011 की जनगणना में बढ़कर करीब 10.42 करोड़ हो गई। इसमें लगभग 23.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो राष्ट्रीय औसत से अधिक बताई गई है।

बयान में यह भी दावा किया गया है कि आगामी जनगणना में अनुसूचित जनजातियों की आबादी लगभग 12.7 करोड़ तक पहुंच सकती है। इसके आधार पर लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जनजातियों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में वृद्धि होने की संभावना जताई गई है।
बयान में यह भी कहा गया है कि यदि भविष्य में लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 किए जाने का प्रस्ताव लागू होता है, तो अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या भी आनुपातिक रूप से बढ़ेगी। साथ ही यह उल्लेख किया गया कि वर्ष 2002 में संपन्न और 2008 से लागू परिसीमन के बाद लोकसभा में अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटें 41 से बढ़कर 47 हो गई थीं तथा कई राज्यों की विधानसभाओं में भी उनका प्रतिनिधित्व बढ़ा था।
बयान के अंत में लोगों से अपील की गई है कि वे परिसीमन और जनगणना को लेकर किसी भी प्रकार की अफवाह या भ्रम से बचें, तथ्यों और संवैधानिक प्रावधानों पर भरोसा रखें तथा जनगणना एवं परिसीमन की प्रक्रिया में सहयोग करें।