भिलाई। अब वह दिन दूर नहीं जब प्लास्टिक की पानी की बोतल और उसके ढक्कन, खाने का डिब्बा इस्तेमाल करने के बाद कचरा नहीं बनेगा, बल्कि कुछ ही महीनों में मिट्टी में मिलकर खाद बन जाएगा। भिलाई की रूंगटा यूनिवर्सिटी की फैकल्टी ने खेतों के कचरे से ऐसी नई तकनीक विकसित की है, जो प्लास्टिक का सस्ता, मजबूत और पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल विकल्प बनेगा।
इस तकनीक में बांस के रेशे, इमली के बीज का पाउडर, स्टार्च और बायोपॉलिमर (पीएलए) मिलाकर एक खास बायोकॉम्पोजिट तैयार किया गया है। यह पूरी तरह स्वदेशी और प्राकृतिक संसाधनों से बना है। इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह उपयोग के समय मजबूत रहे और उपयोग के बाद आसानी से मिट्टी में मिल जाए। यानी अभी तक जो काम प्लास्टिक कर रहा है, वही अब यह नई तकनीक करेगी। इससे पानी की बोतल से लेकर सबकुछ बनाया जा सकेगा।
इस प्रोजेक्ट को अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद की रिसर्च प्रमोशन स्कीम के तहत 32.56 लाख रुपए का सहयोग मिला है, जिससे इसे बाजार तक लाने की प्रक्रिया तेज हुई है। इसके साथ ही इसको कर्मशियल बनाने के लिए बड़े पैमाने पर रिसर्च भी की जा रही है।

कितनी जल्दी बन जाएगी खाद
इस तकनीक का इजाद करने वाले एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अग्निवेश सिन्हा ने बताया कि, इस मटेरियल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह लगभग 170 दिनों में 90 प्रतिशत से ज्यादा जैव-अपघटित हो जाता है। यानी यह प्लास्टिक की तरह सालों तक नहीं रहता, बल्कि कुछ महीनों में ही मिट्टी में मिलकर खाद बन जाएगा। यह नया पैकेजिंग उत्पाद प्लास्टिक के बराबर मजबूत हैं। इनमें अच्छी ताकत, लचीलापन और नमी व ऑक्सीजन को रोकने की क्षमता है। साथ ही यह खाने-पीने की चीजों के लिए सुरक्षित हैं, इसलिए खाद्य पैकेजिंग के लिए भरोसेमंद विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। यह तकनीक खासतौर पर पैकेजिंग सेक्टर के लिए विकसित की गई है। इसके जरिए बोतलों के ढक्कन, छोटे कंटेनर और खाद्य पैकेजिंग जैसे कठोर उत्पाद बनाए जा रहे हैं।
पर्यावरण को मिलेगी राहत
इस तकनीक से प्लास्टिक का कचरा कम होगा, जिससे जमीन और पानी का प्रदूषण घटेगा। साथ ही कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आएगी। यह सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा देगा, जिसमें कचरे को ही उपयोगी चीजों में बदल दिया जाएगा। इस कोशिश से खेती का बचा हुआ कचरा अब बेकार नहीं जाएगा। इससे किसानों को अतिरिक्त आय मिलेगी और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर बनेंगे। साथ ही पर्यावरण के प्रति जागरूकता भी बढ़ेगी।
उद्योग के लिए आसान और सस्ता
रूंगटा यूनिवर्सिटी के डायरेक्टर रिसर्च एंड डेवलपमेंट डॉ. एजाजुद्दीन ने बताया कि, इस तकनीक को मौजूदा इंजेक्शन मोल्डिंग मशीनों पर ही बड़े पैमाने पर तैयार किया जा सकता है। यानी कंपनियों को नई मशीनों पर खर्च नहीं करना पड़ेगा। इससे उत्पादन सस्ता और आसान रहेगा। यह पूरी तरह स्वदेशी तकनीक है, जिससे आयात पर निर्भरता कम होगी और देश में ही उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा। फिलहाल यह तकनीक परीक्षण और पायलट स्तर पर है। इसे जल्द ही व्यावसायिक स्तर तक ले जाकर बाजार में उतारने की योजना पर काम तेज हो गया है।
सिंगल यूज प्लास्टिक पर लगी है रोक
आज प्लास्टिक दुनियाभर में सबसे बड़ी समस्या बन चुका है। यह आसानी से खत्म नहीं होता और जमीन, पानी व हवा को लंबे समय तक नुकसान पहुंचाता है। सिंगल यूज प्लास्टिक के कारण नदियां गंदी हो रही हैं, फसलें प्रभावित हो रही हैं और लोगों की सेहत पर भी असर पड़ रहा है। इसी वजह से सरकार ने 2022 में इस पर रोक लगाई, लेकिन इसके बेहतर विकल्प की कमी अब तक बनी हुई थी। इस तकनीक के जरिए इस गैप को सही करने की कोशिश दोबारा से शुरू की गई है।

